Untitled Document
 
मुख्य पृष्ठ परिचय ज्योतिष सेवाएँ  पंचांग राशिफल काल सर्प दोष संपर्क करें
 
 
कुंडली मिलान
कुण्डली (जिसे जन्म-कुण्डली, जनम कुंडली, जन्म पत्रिका, जन्मपत्री, वैदिक कुण्डली, हिन्दू कुण्डली आदि नामों....
आगे पढ़ें...
 
 
आपका व्यवसाय
जब आप अपने भविष्य के विषय में निर्णय लेते हैं उस समय अक्सर मन में सवाल उठता है कि ...
आगे पढ़ें...
 
 
 
वास्तु सलाह
 
वास्तु शास्त्र भारत की प्राचीन वास्तु कला है, जिसके उपयोग से वास्तु (मकान आदि) का निर्माण करना चाईए, ताकि जीवन में कम से कम दुःख आये एवं जीवन खुशियों से परिपूर्ण हो | भारतीय शास्त्रों में वास्तु पुरुष की कल्पना एक देवता के रूप में की गई है | प्राचीन काल से अब तक मानवीय निर्माण में बहुत से परिवर्तन आ चुके है, उसी अनुरूप वास्तु शास्त्र को भी परिवर्तित किया गया है, वर्तमान वास्तु के कई सिद्धांत, प्राचीन वास्तु से मेल नहीं खाते, अत: मानव आज भी वास्तु से पूर्ण संतुष्ट नहीं है, जैसे प्राचीन वास्तु में मल निकासी की जगह (टॉयलेट) को घर के वास्तु में जगह नहीं दी गई थी, बल्कि घर से बाहर उसकी व्यवस्था को कहा गया था, परन्तु आज के वास्तु में उसको जगह (नेश्रत्य कोण या दक्षिण) दी गई है, वस्तुत: वो पितृ कोण या यम कोण है एवं ये दोनों ही देवता गिने जाते है, तो उस जगह पर मल निकासी अनुचित ही है पर वर्तमान समय में इसका पर्याय नहीं है

अनेक लोग वास्तु के नियमों की तब तक परवाह नहीं करते हैं, जब तक उनका समय अनुकूल रहता है एवं धन अथवा बल से उन्हें जीवन की हर समस्या को सुलझाने का विश्वास रहता है, परंतु तीव्र वास्तु दोष रहने पर ऐसी स्थितियां सदैव नहीं रहती हैं। समय के प्रतिकूल होते ही घातक बीमारियां या अप्रत्याशित दुर्घटनाएं जीवन में अनायास प्रवेश कर जाती हैं, अधिकांश लोगों को तभी वास्तु के नियमों का आभास होता है। परंतु वास्तु सम्मत निवास स्थान पर ऐसी दुष्कर परिस्थितियों की संभावना न्यूनतम अथवा क्षीण होती है।

मकान का द्वार बनाने के लिए दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य) को छोड़कर प्राय: सभी दिशाएं कमोबेश रूप से उचित हैं। परंतु सभी मकानों में आकृति एवं आंतरिक सज्जा महत्वपूर्ण होती है। वास्तु सम्मत अनुकूल आकार एवं सज्जा द्वारा सभी दिशाओं के प्रवेश द्वार को सकारात्मक बनाया जा सकता है।
 
 
 
Untitled Document